कॉलेज का प्रथम वर्ष था/ पढाई ठीक ठाक चल रही थी/ फिर उत्सुकतावश कॉलेज की ncc (नेशनल कैडेट कोर्प्स) में भी शामिल हो गया. परेड हर शनिवार को होती थी (इस दिन कॉलेज बंद हुआ करता था)/ क्या परेड होती थी यार...चिल्चिली धुप में जान और जुबान दोनों ही सूख जाती थी/ लेकिन में टिका रहा (और बहुत सरे कैडेट्स के साथ)/ और फिर दिन बीतते रहे...
फिर एक दिन एक 12 दिन का कैंप जाने का अवसर मिला. मैंने सोचा, 'चलो चलते हैं'/ कैंप दिल्ली मे ही था/ दिल्ली कैंट का एरिया/ कैंप पहुँचने के दुसरे ही दिन पता चला की कैंप में हमारे साथ Jesus & Marry कॉलेज की लडकियां भी आयीं हैं/ मन ख़ुशी से बाग़ बाग़ हो गया/ कसम से इतनी ख़ुशी इंसान को दो चार बार ही मिलती है...मुझे पहली बार ही मिली थी/ हा हा हा....
अरे आपको बताना ही भूल गया की इसी दोरान मेरे दो अच्छे दोस्त भी बन गए थे/ नाम तो भूल गया हूँ/ लेकिन बड़े कमीने थे/ बेहद खूबसूरत समय था वो/
दोस्तों के चक्कर में Jesus & Mary कॉलेज की लड़कियों को तो भूल ही गया/ अच्छा तो बीच में हुआ ये के लड़कियों के ground (जहाँ लडकिय परेड किया करती थीं) पर कुछ गमले लगाने का हुकुम हुआ/ काम लड़कों के जिम्मे आया/ पुछा गया तो हम तीनो (में और मेरे वो दोनों दोस्त) ने हाँ में हाथ खड़ा कर दिया/ 'अरे गमले ही तो उठाने है...उठा लेंगे...लडकियां तो देखने को मिलेंगी' - हम्मे से किसी एक ने ये कहा/ तीनो खुश थे/
अगली सुबह
सुबह 5 बजे उठे/ बदन पे खादी रंग का निक्कर और अन्दर पहने जाने वाली सफ़ेद बनियान/ फिर आव देखा न ताव, पहुँच गए लड़कियों के ground पर/ वैसे उन दो चार दिनों के लिए हम तीनो सुबह सुबह की परेड से बच जाते थे/ ground जाकर देखा तो लड़कियां परेड कर रहीं थीं/ खुद परेड करने में कभी वो मजा नहीं आया जो अब आ रहा था/ तभी major zero वहां आ गए (क्या नाम था...major zero अभी तक याद है)/ फिर क्या था, गमले उठाना शुरू कर दिया/ दरअसल गमलों को ground पे एक जगह से दूसरी जगह तक ले जाना का काम था/
पहला गमला उठाते ही माँ, बहन, दादी, नानी, सब याद आ गयीं/ यही हाल उन दोनों का भी था/ दरअसल गमले काफी भारी थे/ लेकिन क्या करते, जैसे तैसे गमले उठाये/ दो चार दिन का ही काम था/ लेकिन हम तीनो ने अपनी अपनी सेलेक्ट कर ली थी/ बाद में पता चला, मेरी वाली NCC GIRLS बटालियन की कमांडर थी (designation भूल चूका हूँ...बस इतना याद है, की वो सबको लीड कर रही थी)/ एक दो बार बात करने की कोशिश भी की पर बात नहीं बनी/ कहाँ कमांडर और कहाँ ये अदना सा कैडेट/ लेकिन हिम्मत नहीं छोड़ी/ लगा रहा/ वैसे भी भगवान कहते ही रहते हैं, 'की कर्म करो बच्चा, फल की चिंता मत करो'/ हा हा हा....
और भी बहुत सारी यादें हैं, NCC कैंप के उन १२ दिनों की/ कोशिश करूगा की अगली किसी पोस्ट में लिखूं/ आप यहाँ आये/ ये ब्लॉग पड़ा/ इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद्/
एक निवेदन
अच्छा लगता है, जब आप कुछ कमेन्ट करते हैं/ कुछ suggestion देते हैं/ एक confidence मिलता है, और लिखने के लिया/ तो जरूर जरूर, अपना फीडबैक दे/ एक बार फिर से आप सब को बहुत बहुत धन्यवाद्/
आपका अशोक
(note: it's work of fiction, imagination...it may contain some elements of my real-life experiences)
फिर एक दिन एक 12 दिन का कैंप जाने का अवसर मिला. मैंने सोचा, 'चलो चलते हैं'/ कैंप दिल्ली मे ही था/ दिल्ली कैंट का एरिया/ कैंप पहुँचने के दुसरे ही दिन पता चला की कैंप में हमारे साथ Jesus & Marry कॉलेज की लडकियां भी आयीं हैं/ मन ख़ुशी से बाग़ बाग़ हो गया/ कसम से इतनी ख़ुशी इंसान को दो चार बार ही मिलती है...मुझे पहली बार ही मिली थी/ हा हा हा....
अरे आपको बताना ही भूल गया की इसी दोरान मेरे दो अच्छे दोस्त भी बन गए थे/ नाम तो भूल गया हूँ/ लेकिन बड़े कमीने थे/ बेहद खूबसूरत समय था वो/
दोस्तों के चक्कर में Jesus & Mary कॉलेज की लड़कियों को तो भूल ही गया/ अच्छा तो बीच में हुआ ये के लड़कियों के ground (जहाँ लडकिय परेड किया करती थीं) पर कुछ गमले लगाने का हुकुम हुआ/ काम लड़कों के जिम्मे आया/ पुछा गया तो हम तीनो (में और मेरे वो दोनों दोस्त) ने हाँ में हाथ खड़ा कर दिया/ 'अरे गमले ही तो उठाने है...उठा लेंगे...लडकियां तो देखने को मिलेंगी' - हम्मे से किसी एक ने ये कहा/ तीनो खुश थे/
अगली सुबह
सुबह 5 बजे उठे/ बदन पे खादी रंग का निक्कर और अन्दर पहने जाने वाली सफ़ेद बनियान/ फिर आव देखा न ताव, पहुँच गए लड़कियों के ground पर/ वैसे उन दो चार दिनों के लिए हम तीनो सुबह सुबह की परेड से बच जाते थे/ ground जाकर देखा तो लड़कियां परेड कर रहीं थीं/ खुद परेड करने में कभी वो मजा नहीं आया जो अब आ रहा था/ तभी major zero वहां आ गए (क्या नाम था...major zero अभी तक याद है)/ फिर क्या था, गमले उठाना शुरू कर दिया/ दरअसल गमलों को ground पे एक जगह से दूसरी जगह तक ले जाना का काम था/
पहला गमला उठाते ही माँ, बहन, दादी, नानी, सब याद आ गयीं/ यही हाल उन दोनों का भी था/ दरअसल गमले काफी भारी थे/ लेकिन क्या करते, जैसे तैसे गमले उठाये/ दो चार दिन का ही काम था/ लेकिन हम तीनो ने अपनी अपनी सेलेक्ट कर ली थी/ बाद में पता चला, मेरी वाली NCC GIRLS बटालियन की कमांडर थी (designation भूल चूका हूँ...बस इतना याद है, की वो सबको लीड कर रही थी)/ एक दो बार बात करने की कोशिश भी की पर बात नहीं बनी/ कहाँ कमांडर और कहाँ ये अदना सा कैडेट/ लेकिन हिम्मत नहीं छोड़ी/ लगा रहा/ वैसे भी भगवान कहते ही रहते हैं, 'की कर्म करो बच्चा, फल की चिंता मत करो'/ हा हा हा....
और भी बहुत सारी यादें हैं, NCC कैंप के उन १२ दिनों की/ कोशिश करूगा की अगली किसी पोस्ट में लिखूं/ आप यहाँ आये/ ये ब्लॉग पड़ा/ इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद्/
एक निवेदन
अच्छा लगता है, जब आप कुछ कमेन्ट करते हैं/ कुछ suggestion देते हैं/ एक confidence मिलता है, और लिखने के लिया/ तो जरूर जरूर, अपना फीडबैक दे/ एक बार फिर से आप सब को बहुत बहुत धन्यवाद्/
आपका अशोक
(note: it's work of fiction, imagination...it may contain some elements of my real-life experiences)


Nice blog..it shows all your efforts..i think that you were very punctual at ur college time and as well watching with some beautifull faces .. :P....Appreciating your writing skills...All the best For future :))) Hope u will continue ur blog writing with differnt diff. thoughts....
जवाब देंहटाएंha ha ha! nice post..
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